भारतीय टीम से खेलने वाले तेज़ गेंदबाज़ दीपक चाहर जिनको घरेलू क्रिकेट में खेलते हुए काफी समय हो गया था, लेकिन उन्हें अपने करियर में अधिकतर समय चोटिल होने की वजह से बाहर बैठकर गुजारना पड़ा है। लेकिन दीपक की किस्मत उस समय बदली जब उनको आईपीएल में महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी में चेन्नई सुपर किंग्स से खेलने का मौका मिला और पिछले 2 सीज़न से वह टीम के लगातार शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं और इसी कारण उन्हें भारतीय टीम से भी खेलने का मौका मिल गया।
इसमें किसी भी तरह का कोई संदेह नहीं है, कि इंडियन प्रीमियर लीग में यदि कोई खिलाड़ी शानदार खेल दिखाता है, तो उसे जल्द ही भारतीय टीम से बुलावा आ जाता है। हमने हमेशा किसी भी आईपीएल सीज़न के खत्म होने के बाद इस बात को देखा है, कि उस सीज़न में अच्छा करने वाले 1 से 2 खिलाड़ियों को भारतीय टीम के साथ शामिल कर लिया जाता है और दीपक चाहर के मामले में भी ऐसा ही देखने को मिला है।
चाहर ने वेस्टइंडीज़ के खिलाफ दूसरे वनडे मैच से पहले हुई प्रेस कॉंफ्रेस में पत्रकारों से बात करते हुए अपने करियर से जुड़े कई सवालों का जवाब दिया। घरेलू क्रिकेट में बिताये समय से लेकर किस तरह से उन्होंने हालात के अनुसार अपने खेल में बदलाव करना सभी के बारे में बताया और ऐसे ही उन्हें भारतीय क्रिकेट टीम में जगह भी मिली।
दीपक ने अपने बयान में कहा कि, जब मैने गति बढ़ाने के लिए अपने एक्शन में बदलाव किया तो मुझे काफी संघर्ष करना पड़ा और इस कारण मुझे लगा कि मैं भारतीय टीम में अपनी जगह नही बना पाउंगा। यदि मैं रणज़ी में ही खेलता रहता तो मुझे अधिक मैच खेलने पड़ते, जिसमें घरेलू सीजन के सभी मैच के साथ दिलीप ट्राफी के मैच भी जो एक अधिक लंबा रास्ता हो जाता।
लेकिन यदि आप आईपीएल में बेहतर प्रदर्शन करते हैं, तो आपको जल्द ही भारतीय टीम से खेलने का मौका मिल सकता है। इसी कारण मैने लिमिटेड ओवर्स में खेलने की तरफ अधिक ध्यान लगाया और परिणाम आप सभी के सामने है।
दीपक ने बताया आखिर किस तरह उन्होंने अपने खेल में बदलाव किया
भुवनेश्वर कुमार के लगातार चोटिल होने की वजह से दीपक चाहर भारतीय क्रिकेट टीम में लिमिटेड ओवर्स के फार्मेट में एक प्रमुख गेंदबाज़ बनते जा रहे हैं। चाहर ने इस बात का खुलासा किया कि आखिर उन्होंने किस तरह से अपनी मजबूती और कमजोरियों को लेकर काम किया ताकि वह शॉर्टर फार्मेट में अपने खेल को सुधार सके।
दीपक ने कहा कि, जब मैं रणज़ी ट्राफी में खेलता था, तो उस समय मैं 125 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से गेंदबाज़ी करने की कोशिश करता था, चोटिल होने की वजह से मुझे काफी अधिक संघर्ष करना पड़ा क्योंकि मुझे पता था, कि यदि मैं इसी गति के साथ गेंदबाज़ी करता रहा तो अधिक दिन तक नहीं खेल सकता।
मुझे अपनी गति को 140 किलोमीटर प्रति घंटे के आसपास लेकर जानी थी, जिससे स्विंग को भी धार बनाया जा सके, क्योंकि 135 से 137 की गति से आने वाली स्विंग गेंद को खेलना बल्लेबाज़ो के लिए आसान काम नहीं होता है। वहीं रेड बॉल के साथ आपको रिवर्स स्विंग आसानी से मिल जाती है और इसी कारण रणजी स्तर पर आपको ऐसा करते हुए कई गेंदबाज़ दिखेंगे।
लेकिन व्हाइट बॉल क्रिकेट में ऐसा करना आसान काम नहीं होता है, आपका एक्शन उसके मुताबिक होना चाहिए, जिसके बाद मैने अपनी गति को बढ़ाने का फैसला करने के साथ मैने स्लोवर बाउंसर गेंद पर भी काम किया अब मेरा आत्मविश्वास काफी बढ़ा हुआ है और मैं यॉर्कर गेंद भी आसानी के साथ डाल सकता हूं।
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