लेकिन फाइनल में लार्ड्स के मैदान पर भारतीय टीम का मुकाबला लगातार 2 विश्वकप जीतने वाली दिग्गज़ वेस्टइंडीज़ की टीम के साथ था और उस मैच में भारत ने पहले खेलते हुए सिर्फ 183 रन ही बना सकी और विंडीज़ टीम को देखते हुए सभी को उम्मीद थी, कि वह तीसरी बार लगातार विश्वविजेता बनने जा रहे हैं।
कपिल देव की कमान में भारतीय टीम के कुछ अलग ही इरादे थे और उन्होंने पूरी विंडीज़ टीम को लक्ष्य हासिल नहीं करने दिया और पहली बार विश्वकप को अपने नाम पर किया और इसके बाद भारत में क्रिकेट को लेकर जो लहर उठी उसी का नतीज़ा है, कि इस देश में क्रिकेट एक धर्म के रूप में देखा जाने लगा।
आज के समय भारतीय टीम के लिए खेलने वाले हर एक खिलाड़ी को मैच फीस और दैनिक भत्ते के रूप में लाखो रूपयें मिलते हैं, लेकिन 1983 में टीम को पहली बार विश्वविजेता बनाने वाली टीम को दैनिक भत्ते के रूप में 200 रूपये प्रतिदिन मिलते थे, जबकि मैच फीस के रूप में उन्हें 1500 रूपये दिये जाते थे।
2011 में 28 साल के बाद भारतीय टीम ने दूसरी बार विश्वकप की ट्राफी को अपने नाम पर किया जिसके बाद टीम के हर खिलाड़ी को नकद इनाम के साथ बाकी कई उपहार मिले। हर खिलाड़ी को बीसीसीआई की तरफ से 2 करोड़ रूपये अलग से मिले वहीं अपने राज्य क्रिकेट संघ के अलावा राज्य सरकारो से भी उन खिलाड़ियों को इनाम मिला।
इस विश्वकप में भारतीय टीम का सफर सेमीफाइनल तक ही सीमित रहा लेकिन इसके बावजूद टीम को काफी धनराशी इनाम के रूप में मिली, क्योंकि सेमीफाइनल में पहुंचने के कारण टीम को लगभग 5.5 करोड रूपये और ग्रुप स्टेज में जीते हुए मैचों में 40000 डॉलर की धनराशी आईसीसी की तरफ से भारतीय टीम को मिली।
1983 भारतीय क्रिकेट की सैलरी स्लिप की शीट | Indian Team Salary After 1983 World Cup
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