वेस्टइंडीज़ के खिलाफ साल 2019 की आखिरी वनडे सीरीज़ में जीत हासिल करते हुए भारतीय टीम ने सही दिशा की तरफ अपने कदमों को अग्रसर रखा हुआ है, साथ ही यह इस दशक का शानदार अंत भी है और इसमें भारतीय क्रिकेट में कई सुनहरी यादें भी जुड़ी हैं, जिसमें टीम ने साल 2011 के आईसीसी वनडे विश्वकप को अपनी घरेलू जमीन पर जीतने के साथ ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर टेस्ट सीरीज़ को जीतने वाली पहली एशियाई टीम बनने का भी तमगा हासिल किया।
इस दशक में भारतीय टीम ने 112 द्विपक्षीय सीरीज़ो में से 72 को अपने नाम पर किया जिस कारण जीत का प्रतिशत लगभग 65 के पास का रहा। इन सभी आंकड़ो को ध्यान में रखते हुए यह बात कही जा सकती है, कि इस दशक में भारतीय क्रिकेट और भी अधिक मजबूत हुआ है। लेकिन इस सिक्के का एक दूसरा पहलू भी है, जिसमें टीम को निराशा भी देखने को मिली है और सभी भारतीय क्रिकेटिंग फैंस का दिल भी टूटा जिसके बाद हम आपको इस दशक में 10 सबसे निराशाजनक पलों के बारे में बताने जा रहे हैं।
1 – 6 महिने के अंदर 2 बार हुआ टेस्ट सीरीज़ में हुआ सफाया
साल 2011 भारतीय क्रिकेट इतिहास में जहां ऐतिहासिक तौर पर देखा जाता है, क्योंकि टीम ने 28 साल के आईसीसी वनडे विश्वकप को अपने नाम पर किया था, लेकिन इसी साल टीम को टेस्ट क्रिकेट में शर्मनाक हार का भी सामना करना पड़ा था। उस समय टीम में सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़ और वीवीएस लक्ष्मण जैसे बड़े खिलाड़ी मौजूद होने के बावजूद टीम को इस हार का सामना करना पड़ा था।
इस साल विश्वकप में जीत के बाद टीम को इंग्लैंड का दौरा करना था और उसके बाद टीम को ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर जाना था, जिसमें इन दोनों ही सीरीज़ में टीम ने कुल 8 टेस्ट मैच खेले और सभी में टीम को हार का सामना करना पड़ा, जिसमें से 4 टेस्ट मैचो में तो टीम को एक पारी से हार का सामना करना पड़ा वहीं 6 महिने के अंदर भारतीय टीम का 2 टेस्ट सीरीज़ में सफाया देखने को मिला।
महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी में टीम पूरी तरह से अपने विरोधियों का सामना करने में सक्षम नहीं दिखाई दी, जिसके बाद भारतीय क्रिकेट को 2 दिग्गज़ खिलाड़ी राहुल द्रविड़ और वीवीएस लक्ष्मण ने इसी दौरान अपने संन्यास का ऐलान करते हुए चुपचाप अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह दिया।
2 – घर पर भी मिली सीरीज़ में हार
एक समय जब भारतीय टीम को घर पर टेस्ट सीरीज़ में हराना एक मुश्किल काम होता था, क्योंकि टीम ने लगातार 12 टेस्ट सीरीज़ को अपने नाम पर किया था। लेकिन इसके बाद चीजे थोड़ा उस समय बदली जब इंग्लैंड की टीम साल 2012 में भारत के दौरे पर टेस्ट सीरीज़ खेलने के लिए आयी थी।
उस समय भारतीय टीम में युवा खिलाड़ी शामिल किए गये थे, जिसका पूरा लाभ इंग्लैंड की टीम ने उठाया और महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी में भारतीय टीम को 4 मैचो की टेस्ट सीरीज़ 1-2 से हार का सामना करना पड़ा, खास करके सभी को उस समय काफी बुरा लगा जब टीम ने पहले टेस्ट मैच में जीत हासिल करके सीरीज़ को इस तरह से गवांया था। इंग्लैंड टीम के स्पिन गेंदबाज़ो के सामने भारतीय बल्लेबाज़ो ने अपने घुटने पूरी तरह से टेक दिए थे।
इस सीरीज़ हार के साथ जहां भारतीय टीम का घरेलू जमीन पर दबदबे को लेकर सवाल उठाये जाने लगे तो वहीं टीम के भविष्य को लेकर भी एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया और वहीं पूर्व भारतीय खिलाड़ी सुनील गावस्कर और मोहिंदर अमरनाथ ने टीम में नेतृत्व के बदलाव को लेकर कहने लगे जिसके अंत के बाद सभी ने भारतीय क्रिकेट के लिए एक कठिन समय के तौर पर इसे बताया।
3 – बांग्लादेश के खिलाफ सीरीज़ गवांयी
पिछले कई सालों से भारत और बांग्लादेश के बीच होने वाली सीरीज़ को लेकर एक अलग ही रोमांच फैंस के बीच देखने को मिलता हैं, इसकी शुरुआत सार 2007 के विश्वकप में हुई थी, जब बांग्ला टाइगर्स ने भारतीय टीम को विश्वकप के ग्रुप मैच में हराकर उसे टूर्नामेंट से बाहर का रास्ता दिखा दिया था, जिसके बाद साल 2015 के विश्वकप में भारतीय टीम का इस हार का बदला लेते हुए उन्हें टूर्नामेंट से बाहर करना।
साल 2015 के विश्वकप के खत्म होने के बाद जहां भारतीय टीम को टूर्नामेंट के सेमीफाइनल मैच में ही सिर्फ हार का सामना करना पड़ा था, उसके बाद टीम को बांग्लादेश के दौरे पर जाना था, जहां पर सभी को विश्वास था, कि यह सीरीज़ एकतरफा ही होने वाली है, लेकिन बांग्लादेश ने सभी को चौकाते हुए 3 मैचो की वनडे सीरीज़ के पहले मैच में 70 रन से जीत दर्ज की जिसके बाद उन्होंने दूसरे मैच में भी भारतीय टीम को हराकर अपने क्रिकेट इतिहास में भारत के खिलाफ पहली द्विपक्षीय वनडे सीरीज़ को अपने नाम पर किया।
लेकिन अंतिम मैच में भारतीय टीम ने सीरीज़ में सफाये से बचने के लिए आखिरी मैच में जीत हासिल करके अपने सम्मान को बचाया, इस सीरीज़ के बाद पूरा क्रिकेट जगत भी काफी अचम्भे में था, क्योंकि एशिया की सबसे मजबूत टीम का हराना के भी गले से नहीं उतर रहा था।
4 – गाले में जीतते-जीतते करना पड़ा हार का सामना
जैसा की आपको इस टाइटल से समझ आ रहा है, कि भारतीय टीम इस मैच में जीत हासिल करने के काफी करीब थी, लेकिन आखिर में उसे हार का सामना करना पड़ा। टीम इंडिया 3 मैचो की टेस्ट सीरीज़ के लिए श्रीलंका के दौरे पर गयी हुई थी, जिसका पहला मैच गाले में खेला जा रहा था, इस मैच की पहली पारी में श्रीलंकन टीम सिर्फ 190 के स्कोर पर सिमट गयी थी, जिसके बाद भारतीय टीम ने अपनी पहली पारी में 375 रन बना दिए।
200 रनों के करीब पहली पारी में बढ़त हासिल करने के बाद भारतीय टीम की मैच में पकड़ काफी मजबूत हो गयी थी और श्रीलंका की टीम दबाव में थी, जिसका असर दूसरी पारी में भी उस समय देखने को मिला जब श्रीलंका के 5 विकेट 100 रनों के भीतर ही सिमट गये और टीम पर पारी की हार का खतरा मंडराने लगा लेकिन उस समय दिनेश चांदीमल ने पूरी मैच की तस्वीर को अपने आक्रामक बल्लेबाज़ी से बदलकर रख दिया।
एक समय जहां श्रीलंका की टीम पारी की हार को टालने की कोशिश कर रही थी, तो दिनेश चांदीमल की पारी की वजह से टीम ने विराट कोहली की कप्तानी वाली भारतीय टीम के सामने चौथी पारी में 175 रनों का लक्ष्य रख दिया जिसके बाद भारतीय टीम मैच की अपनी दूसरी पारी में सिर्फ 112 रन बनाकर सिमट गयी और टीम को जीतते हुए मैच में हार का सामना करना पड़ा जिसकी कल्पना पहले किसी ने नहीं की थी।
5 – घरेलू जमीन पर मिली शर्मनाक हार
साल 2015 में दक्षिण अफ्रीका की टीम भारतीय दौरे पर आयी थी और उस समय सभी को विश्वास था, कि यह सीरीज़ बेहद रोमांचक होने वाली है, क्योंकि दोनों ही टीमों का फार्म काफी शानदार था, जिसमें पहले टी20 सीरीज़ खेली गयी जो बराबरी पर खत्म हुई इसके बाद वनडे सीरीज़ के मैच खेले गए।
3 मैचो की वनडे सीरीज़ 1-1 से बराबरी थी और सीरीज़ का आखिरी मैच मुम्बई के वानखेडे मैदान पर खेला जाना था, इस मैच में अफ्रीका टीम ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए 4 विकेट के नुकसान पर 438 रनों की विशाल स्कोर बना दिया। भारतीय गेंदबाज़ पूरे मैच में हर तरफ से निराशा लेकर आये।
फैंस को उम्मीद थी, कि भारतीय टीम इस स्कोर के जवाब में एक लड़ाई जरुर दिखायेगी लेकिन टीम को मैच में 214 रनों की बड़ी हार का सामना करना पड़ा और किसी समय ऐसा नहीं लगा टीम इस लक्ष्य को पाने की भी कोशिश कर रही है। इस हार के बाद पूरी टीम को आलोचना झेलनी पड़ी थी।
6 – वानखेडे में टूटा सभी का दिल
भारतीय टीम ने साल 2007 में खेले गए पहले टी20 विश्वकप में जबसे जीत हासिल की थी, उसके बाद से विश्वकप के हर एडीशन में उन्हें भाग्य का साथ देने वाली टीम के तौर पर देखा जाने लगा। लेकिन जब इस टूर्नामेंट को एशिया की जमीन पर खेला जाना था, तो टीम इंडिया को जीत के दावेदार के तौर देखा जाना लाजिमी था।
साल 2016 में आईसीसी टी20 विश्वकप भारत में खेला जाना था, जिसमें ग्रुप स्टेज में भारतीय टीम ने शानदार खेल दिखाते हुए सेमीफाइनल में अपनी जगह को पक्का किया जहां पर टीम का मुकाबला वानखेडे मैदान में वेस्टइंडीज़ के खिलाफ था, लेकिन इस मैच में भी भारतीय टीम को जीत के प्रबल दावेदार के तौर पर देखा जा रहा था।
टीम इंडिया ने भी मैच में पहले बल्लेबाज़ी करते हुए 190 रनों का विशाल स्कोर खड़ा कर दिया और यह बड़े मैच को देखते हुए एक अच्छा स्कोर देखा जा रहा था, लेकिन मैच की दूसरी पारी भारतीय गेंदबाज़ो की तरफ से महत्तवपूर्ण समय पर फेंकी गयी नो बॉल ने पूरी तस्वीर को ही बदलकर रख दिया और अंत में टीम इंडिया का सफर इस विश्वकप में यहीं पर खत्म हो गया, जिसने सभी फैंस के दिलों को तोड़ दिया।
7 – कुंबले और कोहली के बीच अनबन
एक सफल टीम को बनाने में कई लोगों की मेहनत पर्दे के पीछे भी होती हैं, जिसमें सभी बड़ी भूमिका में टीम का मुख्य कोच होता है, जो कप्तान के बाद सबसे जिम्मेदार इंसान के तौर पर देखा जाता है। यह काम बेहद कठिन होता है, जिस कारण इसमें सफल होना हर किसी के लिए आसान नहीं होता और वर्ल्ड क्रिकेट में खुद को अपने खेल से साबित करने वाले कई दिग्गज़ खिलाड़ी भी टीम को कोच करते हुए उतने सफल नहीं दिखाई दिये।
इसी में एक उदाहरण भारतीय टीम के पूर्व खिलाड़ी और साल 2016 में टीम के मुख्य कोच का पद संभालने वाले लेग स्पिनर अनिल कुंबले का है, जिसमें टीम ने उनके कार्यकाल में 1 साल के अंदर 5 टेस्ट सीरीज़ जीतने के साथ 2 वनडे सीरीज़ को भी अपने नाम पर किया था, इसके अलावा साल 2017 की चैंपियंस ट्राफी के फाइनल मैच तक टीम ने अपना सफर तय किया था।
लेकिन इसी के बाद कोच के तौर पर उन्होंने अपना त्यागपत्र अचानक से दे दिया जिसके पीछे सबसे बड़ा कारण कप्तान विराट कोहली को उनकी कोचिंग स्टाइल ना पसंद आना था। इसको लेकर ऐसी खबरे भी सामने आयी थी, कि कोहली ने उस समय बीसीसीआई के सीईओ राहुल जौहरी को कई मैसेज भेजे थे, जिसमें उन्होंने कोच को लेकर अपनी पसंद के बारे में इजहार किया था।
इसके बाद दोनों के बीच अनबन की लगातार खबरे आने के बाद कुंबले ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया लेकिन इसका असर भारतीय टीम के खेल पर बिल्कुल भी देखने को नहीं मिला जो टीम के लिए एक बेहद शानदार बात थी।
8 – पाकिस्तान के खिलाफ मिली फाइनल मैच में हार
भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाला कोई भी मैच क्रिकेट जगत में एक बड़े इवेंट के तौर पर देखा जाता है और खास करके उस समय जब दोनों ही टीमें किसी आईसीसी इवेंट में एक-दूसरे के सामने खेल रही हो। जिसमें साल 2017 की चैंपियंस ट्राफी के फाइनल मैच में भी किसी तरह का अंतर देखने को नहीं मिला था और फैंस भी इस मैच को लेकर बेसब्री से इंतजार कर रहे थे।
जहां एक तरफ भारतीय टीम का आत्मविश्वास टूर्नामेंट में सबसे अधिक अधिक था, क्योंकि वह बिना किसी मैच को गवांये फाइनल तक पहुंचे थे, तो वहीं सरफराज अहमद की कप्तानी वाली पाकिस्तान टीम को भाग्य का काफी साथ मिला था। लेकिन मैच में भारतीय टीम के कप्तान विराट कोहली ने उस समय सबसे बड़ी गलती कर दी जब उन्होंने टॉस जीतने के बाद इस बड़े मैच में पहले गेंदबाज़ी करने का फैसला कर लिया।
पाकिस्तान टीम के बल्लेबाज़ो ने स्कोर पर 50 ओवरो में 330 रन टांग दिये, जिसमें एक महत्तवपूर्ण बात सामने निकलकर आयी कि भारतीय गेंदबाज़ दबाव में अपने प्लान को बिल्कुल ही भूल से गये थे। जिसके बाद पाकिस्तान टीम के तेज़ गेंदबाज़ो ने शुरु से ही विकेट हासिल करते हुए पूरी भारतीय टीम को समेट दिया और सभी फैंस का दिल भी इसी के साथ टूट गया था।
9 – एक सुनहरा मौका गवांया
वर्तमान भारतीय टीम को क्रिकेट इतिहास में सबसे अधिक मजबूत टीमों में से एक माना जाता है, जिस कारण जब टीम विदेशी जमीन पर किसी टेस्ट सीरीज़ में जीत हासिल करती है, तो किसी को अधिक अचम्भा नहीं होता है, जैसा पहले देखने को मिलता था। लेकिन इस दशक में जो एक काम टीम इंडिया नहीं कर सकी वह विदेशी जमीन पर अपने उस रिकॉर्ड को अधिक सुधारने का काम।
खास करके इंग्लैंड की जमीन पर जहां पर इस दशक में टीम ने 3 टेस्ट सीरीज़ खेली और तीनों में ही उसे हार का सामना करना पड़ा। साल 2018 में भारतीय टीम जब पिछली बार इंग्लैंड के दौरे पर गयी थी, तो उसे सीरीज़ जीत के लिए प्रबल दावेदार के तौर पर देखा जा रहा था। जिसके पीछे सबसे बड़ा कारण टीम में मौजूद शानदार तेज गेंदबाज़ो का होना था, जो किसी भी पिच पर 20 विकेट हासिल करने की काबिलियत रखते थे, वहीं दूसरी तरफ इंग्लैंड टीम का बल्लेबाज़ी क्रम भी उतना अधिक मजबूत नहीं दिखाई दे रहा था।
लेकिन भारतीय टीम एक बार फिर से फेल होती हुई दिखाई दी, जिसमें बल्लेबाज़ो से इस बार निराशा देखने को मिली, इसके अलावा कई ऐसे मौके भी टीम ने गवांये जिन्होंने इंग्लैंड को सीरीज़ में अपनी पकड़ को मजबूत करने में और अधिक मदद की जिसके बाद जब 5 मैचो की यह सीरीज़ खत्म हुई तो भारतीय टीम को 4-1 से सीरीज़ में हार का सामना करना पड़ा।
10 – करीब पहुंचकर हो गए दूर
इस दशक में भारतीय टीम ने आईसीसी इवेंट्स में लगातार शानदार प्रदर्शन किया है और आंकड़ो को देखने के बाद यह बात पूरी तरह से साबित भी होती है। यदि पिछले 5 आईसीसी इवेंट को लेकर भारतीय टीम के रिकॉर्ड के बारे में बात की जाए तो उसमें टीम को 2 फाइनल और 3 सेमीफाइनल मैच में हार का सामना करना पड़ा है। इसमें सबसे आखिरी हार टीम को साल 2019 के आईसीसी वनडे विश्वकप के सेमीफाइनल मैच में मिली थी, जिसने सभी भारतीय फैंस के दिलों को एकबार फिर से तोड़ने का काम किया था।
इस मैच से पहले भारतीय टीम को जीत का प्रबल दावेदार माना जा रहा था, जिसमें वह फाइनल में पहुंचने के बेहद करीब थे और न्यूज़ीलैंड टीम की पारी खत्म होने के बाद यह बात और भी अधिक मजबूत दिख रही थी। लेकिन टीम का बल्लेबाज़ी क्रम इस मैच में पूरी तरह से बिखर सा गया जिसके बाद सभी को महेंद्र सिंह धोनी से उम्मीद थी, कि वह इस मैच में टीम को जीत दिला देंगे।
धोनी ने भी रवींद्र जडेजा के साथ शतकीय साझेदारी करके भारतीय टीम को मैच में वापस तो लेकर आये लेकिन वह मैच को पूरी तरह से खत्म नहीं कर सके। धोनी को मार्टिन गुप्टिल के एक सीधे थ्रो ने रन ऑउट कर दिया जो कोई भी भूल नहीं सकेगा। भारतीय टीम को मैच में 18 रनों से हार का सामना करना पड़ा जिसके बाद तीसरी बार विश्वकप जीतने का सपना टीम इंडिया का टूट गया था।
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